पुरी

पुरी

भारत देश के चार प्रमुख धामों में से एक और भगवान जगन्नाथ का वासस्थल पुरी (Puri), उड़ीसा राज्य में स्थित है। श्री कृष्ण के अवतार भगवान जगन्नाथ के इस धाम को किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। ये शहर श्रद्धालुओं और मनोरंजक प्रेमी दोनों तरह के पर्यटकों का स्वागत करता है। एक ओर जहाँ जगन्नाथ मंदिर में गूंजते जयकारें हैं तो वहीं दूसरी ओर चिल्का लेक में प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा और मीलों तक फैला रेतीला समुद्र तट।

जगन्नाथ मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ के बीच दर्शन करने के बाद, पूरी बीच के डूबते सूरज का नज़ारा देखने को मिल जाये तो यकीनन आपका दिन सम्पूर्ण सिद्ध हो सकता है। यदि खरीदारी के शौक़ीन हैं तो स्वर्गद्वार मार्किट में, एक यादगार वस्तु तो मिल ही जाएगी, इसके अलावा गुंडीचा मंदिर और लोकनाथ मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं।

अपने इतिहास, धार्मिक महत्व, अभ्यारणों, विशेष वास्तुकाला और सामान्य जलवायु के कारण प्रतिवर्ष ये शहर देसी-विदेशी पर्यटकों से भरा रहता है। नए उत्साह-ताज़गी और आध्यात्मिक शांति के लिए पुरी का भ्रमण अवश्य करें।

पुरी के बारे मे

पुरी में खरीदारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। हस्तशिल्प वस्तुएं, पीतल सामग्री, कढ़ाईदार कपड़ा, नक्काशें हुए पत्थर, सीप (shell) उत्पाद, नक्काशीदार लकड़ी, सोला नक्काशी, हथकरघा साड़ी, पत्ता चित्रा, चूड़ियाँ, ताड़ के पत्तों पर लेख और अन्य स्थानीय हस्तशिल्प और हथकरघा वस्तुएं, ये सभी उत्तम उत्पाद आपको पुरी के रंगबिरंगे और सजे-धजे बाजारों में खरीदने को मिल जाएँगे।
पुरी के बाजारों में स्वर्ग द्वार बाज़ार और जगन्नाथ बल्लव मार्किट कॉम्पलेक्स से आप कपड़े, सीप की वस्तुएं, सजावटी सामान और हस्तनिर्मित वस्तुएं खरीद सकते हैं।

पुरी की यात्रा सुविधाएं

  • जगन्नाथ मंदिर पुरी का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण है, पुरी भ्रमण में यहाँ के दर्शन जरूर शामिल करें
  • चिल्का झील में डॉलफिन (Dolphin) देखने और बोटिंग (Boating) का लुत्फ़ उठा सकते हैं
  • पुरी बीच से उगते सूरज का नज़ारा एक यादगार पल में शामिल हो सकता है
  • जून-जुलाई के माह में होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान घूमने की योजना बना सकते हैं लेकिन ध्यान रहें कि टिकट और होटल की बुकिंग पहले से करवाएं

पुरी का इतिहास

इतिहास के अनुसार, मूल रूप से इस सघन वन क्षेत्र को द्रविड़ और आर्य से भी पहले "सबारस"(Sabaras) जो एक आदिवासी समूह था के द्वारा बसाया गया था। माना जाता है कि मूल रूप से यह जाति भगवान जगन्नाथ की पूजा "नीलामाधब"(Nilamadhab) के रूप में करती थी, जिसकी मूर्ति वे लाल वृक्ष के तने से बनाते थे, बाद में ब्राह्मणों द्वारा देवता को अपनाया गया।

आठवीं शताब्दी में जगद्गुरु शंकराचार्य (Shankaracharya) ने यहाँ अपने चार मठों में से एक मठ की स्थापना की। साल 1135 में गंग वंश के शासक अनंतवर्मन चोडगंग द्वारा यहाँ भगवान् पुरुषोत्तम को समर्पित एक मंदिर की स्थापना की गई और 15वीं शताब्दी में गजपति शासकों के समय में इसका नाम बदलकर जगन्नाथ कर दिया गया।

मुगलों और मराठों के साथ ही ब्रिटिश शासकों के आधिकारिक दस्तावेजों में भी पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र (Purushottam Kshetra) के नाम से संबोधित किया गया है, यहाँ तक कि योगिनीतंत्र और कल्किपुराण में भी इस शहर का वर्णन पुरुषोत्तम नाम से मिलता है।

पुरी की सामान्य जानकारी

  • राज्य- उड़ीसा
  • स्थानीय भाषाएँ- उड़िया, हिंदी, बंगाली, उर्दू, अंग्रेजी
  • स्थानीय परिवहन- साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा व बस
  • पहनावा- आमतौर पर पुरुष धोती-कुर्ता पहनते हैं और साथ में गमछा लेते हैं तथा महिलायें कटकी, संबलपुरी और बोम्कई नाम की साड़ियाँ पहनती हैं
  • खान-पान- यहाँ के खानपान में एक विशेष प्रकार के मसाले का प्रयोग किया जाता है जिसे पन्चफोरन (Panch phoron) कहते हैं। इन मसालों में जीरा, सरसों, सौंफ, मेथी, कलौंजी और गरम मसाला शामिल है। पुरी में आपको बहुत आराम से बिना प्याज और लहसुन का खाना मिल जाएगा, हालांकि कुछ जगह हैं जहाँ समुद्री भोजन और मांसाहारी व्यंजनों का स्वाद भी चखा जा सकता है। छेनाचेड़ा, आलू पोटला रसा, पोहे और अरिसेलू यहाँ के लोकप्रिय स्थानीय व्यंजन हैं।

पुरी के प्रमुख त्यौहार

  • रथ यात्रा (Rath Yatra)- प्रत्येक वर्ष जून-जुलाई के महीने में रथ यात्रा आयोजित की जाती है जिसमें दुनियाभर से श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के सुसज्जित भव्य रथों को खींचने और दर्शन करने एकत्रित होते हैं। करीब 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में रथों को जगन्नाथ मंदिर के निकट बने उनकी मौसी के मंदिर "गुंडिचा" में ले जाया जाता है जहाँ वे तीनों 9 दिनों के लिए आराम करने और एक प्रकार से छुट्टियाँ बिताने जाते हैं। लकड़ी से बने इन रथों के निर्माण में किसी भी धातु की कील का प्रयोग नही किया जाता है। इस अवसर पर उन्हें कई स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाया जाता है और अंतिम दिन में जगन्नाथ मंदिर में प्रतिमाओं की पुनः स्थापना से उत्सव समाप्त होता है।
  • नवकलेवर (Nabakalebar)- उड़ीसा के पुरी शहर में नवकलेवर उत्सव 12 से 19 साल के अंतराल में रथयात्रा से पूर्व किया जाता है। नवकलेवर एक पौराणिक प्रक्रिया है जिसे सम्पूर्ण रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुदर्शन और देवी सुभद्रा की पुरानी लकड़ी की मूर्तियों को बदलकर उनके स्थान पर नई मूर्तियों को स्थापित किया जाता है और इसी क्रिया को भगवान का पुनर्जन्म माना जाता है।